केरलाफार्मरऑनलाइन.कॉम विविध भाषाई ब्लोग किसानों केलिये एक किसान प्रसारित कर रहा हूँ
  • धीरे धीरे उत्पत्ति- संवंधी बदलाव की गई फसल हमारे खेत भर आने की संभावना हैं। उसकेलिये ही ‘जनटिक एन्जिनीयरिंग अप्रुवल कमटी’ (GEAC) के कोशिश। ऐसे एक कमटी के जरूरत हमें नहीं। सिर्फ हमें ‘जी.ई.ए.सी भारत छोडो’ ही एक मटी को जाननेवाला एक किसान को बोल सकेगा। जनटिक एन्जिनीयरिंग सस्यों के सारे कि सारे कोश योने कि जड से लेकर फल तक जहर फैलाकर कीडे मकोडे भगाते तो वही जहर पशु, पक्षि तथा मनुष्य को भी धीरे धीरे कैसे मारेगा करके सोच सकते हैं। प्रधम हरित परिक्रमा (green revolution) बीमारियों बडाकर और मटी ती जैवाँश को खतम करके जो प्रक्रिया हुआ था वह समझ में आने केलिये कई साल लगा।   उस से भयानक कारवाइ हमारे जनम से पहले मौजूद कीमती बीजों को खतम करके जी.एम बीज जगह लेने की तैय्यारि हो रहा हैं।  दूध केलिये पशुओं के खुराक  cotton seed meal भय के बगैर कैसे दे सकते हैं?  उत्पत्ति- संवंधी बदलाव की गई सूत के बीज से निकलनेवाला तेल का क्या असर हम पर होगा वह कई साल बद ही मालूम पडेगा। अमूल्य गुण हमारे सरसों, मूभली, नारियल वगैरह से निकालकर इस्तेमाल करते थे उनके खिलाफ अफवायें फैलाकर बदले में सोया बीन और पाम ओइल ङमारे रसोई में पहूँच गया।

    परिस्थिती, मटी और जमीनी कीडाओं (earth worms) को बरबाद करनेवाला शत्रु तथा मित्र कीडों के बगैर उत्पत्ति- संवंधी बदलाव  के बिना इन बी.टी फसलों के साथ जो अपतृण पैदा होगा उसे खतम कने केलिये बहूत ही कठिन जहर  ‘रौण्टअप’ (roundup) का इस्तेमाल करने की आवश्यकता होगी।   ‘रौण्टअप’ जहर के प्रचारक बनकर काम करने वाला हमारे वौग्यनिकों को दुशमन ही समझना होगा। उत्पत्ति- संवंधी बदलाव की गई बीजों के नुक्सान पता करने केलिये ज्यादा परीक्षण की जरूरत नहीं हैं। इन पौदों से बनी कूडे की खाद  (compost) में जमीनी कीडाओं को जिंदा नहीं रह सकते हैं। उत्पत्ति- संवंधी बदलाव की गई  बीजों को जो वन्ध्यता  (infertility)  शामिल हैं वही असर मनुष्य समेत हर जीव पर होने की संभावना हैं।

    जनता की भूख मिटाना ही लक्ष्य हैं तो इनसान पर उत्पत्ति-संबन्धी बदलाव करना ही उच्छा होगा। पेड के नापाई कम करके खाने की मात्रा भी कम करना एक महत्वपूर्ण सेवा होगा। अमेरिका की धन संपत्ती वरकरार रखने केलिये उत्पत्ति-संबन्धी बदलाव की गई खाना खाने पर जो बीमारियों होगा उसे इलाज करने केलिये पेटन्ट की छाया की सहरे दवाई बेचकर पूरा करना हैं क्या? अगर जनटिक एन्जिनीयरिंग मटी के सन्तुलित न्यूट्रियन्ट की तुलन सही रखकर जैव संपत्ती की बडते हालात की कायम करने पर दोनों हाथें फैलाकर स्वीकार कर सकते हैं। तमाम भारत  और केरल खास करके आयुरवेद के गुण से जो कुच्छ हासिल की उसे खतम करने  का खेती इस बी.टी का ही होगा। हमारे सारे पानी बरबाद हो चुका हैं। उन  पानी के भविष्य इन बी.टी खेती के वजह से ओर खराब होगा।

    गाय, भैंस, बकरी वगैरह के पान पोषण और दूध और माँस की लभ्यता बडाकर जैव खेती करना ही हमें विश्वसनीय मान सकते हैं। अगर किसान की उत्पन्न सिर्फ पैसा बनाने की मान कर और किसी क शेहत की नुक्सान पहूँचाने का काम आने वाला पीडियों को बरबाद करेगा। आन्ध्रा प्रदेश में सूत की  खेती की गई जमीन पर खास खाने पर भैंस, गाय, बकरी वगैरह मरे और उनके पोस्टमारटम (postmortem)करने पर हृदय में सुराक नजर आये थे। वही अनुभव भविष्य में मनुष्य को भि यही हालात होंगे  उत्पत्ति-संबन्धी बदलाव वाले फसल से पाने वाले खाना खाने से।

    विशेष सूचना- इसी लेख को और मतलबदार बनाने का मदद का स्वागत हैं।

    Picture Courtesy: The Hindu

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  • ग्वालियर. दूध के दामों में आए उफान ने हर परिवार का न केवल बजट गड़बड़ा दिया है बल्कि बच्चों की सेहत का ध्यान रखने वाली गृहणियों को भी चिंतित कर दिया है। दूध महंगा होने का असर उसके अन्य उत्पादों पर भी पड़ा है। दही, पनीर, मावा, मक्खन, क्रीम व घी आदि सभी आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। गर्मियों के साथ ही अचानक बढ़े दूध के दामों का कई स्थानों पर विरोध भी किया गया।

    दीनदयाल नगर व शताब्दीपुरम क्षेत्र की महिलाओं ने तो गत दिनों दाम बढ़ाने के कारण डेयरी संचालकों का बाकायदा विरोध भी किया। हालांकि उनके विरोध का असर दूध के दामों पर नहीं पड़ा। स्थिति यह है कि मजबूरी में छोटे बच्चों की खातिर लोगों को दूध के मुंह मांगे दाम देने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

    मावे पर नहीं लगा प्रतिबंध
    गर्मियों की शुरुआत के साथ ही होने वाली दूध की किल्लत को देखते हुए जिला प्रशासन हमेशा मावा बनाने पर प्रतिबंध लगाता है। इस बार गर्मियों में दूध की किल्लत हो गई, लेकिन मावा बनाने पर प्रशासन की ओर से कोई प्रतिबंध नहीं लगा। इस कारण दूध की कमी होने से भी दामों में एकदम से तेजी आई है।

    सहालग ने बढ़ाई दूध की डिमांड
    शादियों के सीजन में उपयोग होने वाले पनीर, क्रीम और मावे की बढ़ती डिमांड के कारण भी शहर में दूध की कमी हो गई। इस कारण डेयरी चलाने वालों ने दूध के मनमाने भाव वसूलने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं दूध के साथ दूध के अन्य उत्पादों के दामों में भी खासी बढ़ोतरी हुई।

    तापमान बढ़ने से कम हुआ दूध
    अंचल में दूध के उत्पादन से तापमान का सीधा संबंध है। डेयरी संचालक ओमकार सिंह कुशवाह का कहना है कि अंचल में सर्वाधिक दूध भैंसों से निकलता है। भैंस को गर्मी बर्दाश्त नहीं होती और तापमान बढ़ने के साथ ही उसके दूध में कमी आने लगती है। दूध का कम होना और हरे चारे के अभाव में जानवर के खान-पान पर ज्यादा खर्च होने से दूध के दामों पर असर पड़ता है।

    सांची ने भी बढ़ाए दूध-घी के दाम
    मध्यप्रदेश दुग्ध संघ के उत्पाद सांची दूध व घी के दामों में गर्मियों के साथ ही बढ़ोतरी शुरू हो गई। दो सप्ताह पहले सांची घी के दाम दस रुपये बढ़ाते हुए 220 रुपए लीटर कर दिए गए। अब 16 मई से फुल क्रीम दूध की थैली पर भी दो रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की जा रही है। यह दूध अब 24 के स्थान पर 26 रुपए प्रति लीटर के भाव से बेचा जाएगा।

    आभार – दैनिक भास्कर

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  • केरल की किसानों को इकटा करने केलिये और उनके समस्याओं को इन्टेर नेट पर पहूँचाने केलिये एक कोशिश मैं ने शुरू की।

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  • A Dharna by Janapaksham in front of Kerala Secretariate

    A Dharna by Janapaksham in front of Kerala Secretariat

    क्षमा कीजिये। हिन्दी में तबदीली केलिये मुझे कोइ मदद करेगा तो यह हिन्दी में करके दीजिये

    ज्यादा जानकारी केलिये एन.टी.वि वेब सैट पर अंग्रेजी में लिखी बात पढ सकते हैं।

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