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तुम्पूरमूऴि एयरोबिक कम्पोस्टिंग् कचरे से पूर्ण समाधान

“इस देश कि धर्ती सोना उगले हीरे चाँदी मोती”

गंगा हो या नाले उसकी पानी साफ तभी प्राप्त होगा जब हर घर में जैव कचरे की संस्करण ठीत तरीके से हो। इस देश की हर इनसान के प्रधम कर्तव्य यही हैं अपने पर्यावरण सुरक्षित रखें। किसी भी जैव कचरे को नब्बे दिन में अच्छे गुणवत्ता के साथ खाद बना सकते हैं। सब को मालूम हैं भयानक कर्क रोग  जैसे बीमारियाँ रासायनिक कीट्नाशक से ही होता है। हर घर में कुच्छ जैव सबजियाँ, खाने की पत्ते वगैरह अपने छत के ऊपर या बाडा (yard) में पैदा करें, आनेवाली पीढी को बचायें।

TMACT या तुम्पूरमूऴि एयरोबिक् कम्पोस्टिंग् टेक्निक्स (Thumboormuzhi Aerobic Composting Techniques)  की जरिये हर किसम की मृत शरीर को जैव कचरे के साथ खाद की रूप में बदल सकते हैं।

दुरगंध नहीं, एक हफते में 75 डिग्री सेलशियस की ताप की काराण रोगाणू नहीं फैलेगा, मेसिन का जरूरत नहीं स्वयम बना सकेगा, एक जगह से दूसरी जगह पर रख सकेगा, अपने छत पर या बाडा में बना सकेगा, बिन से गंदा पानी की बूंत नहीं गिरेगा, कुच्छ परिवार इकटा भी कर सकेगा, आदी इसकी विशेषतायें हैं। इससे अच्छा कोनसा तरीका होगा जो जैव कचरे को खाद बना सकें?

भारत की कोने कोने में कचरे का प्रबंधन  कठिन समस्या हो गया।  बेकार जैव पदार्धों को खाद की रूप में बदलने केलिये कई तरीके उपलब्द हैं।  लेकिन  क्या हम इस में कामयाप हुये?  नहीं. शहरों में आबादी बड्ते हैं, परंतू  कचरे को  गैर जैविक अपशिष्ट के साथ मिलाकर बेकार किये जाते हैं।  करोडों वर्ष की परिणाम से ही इस धर्ती के ऊपरवाले आधे अंगुल की जैव संपत्ती की परिणाम हुये थे।  उस पर रासायनिक खाद,  कीट्नाशक और घास-फूस नाशी  के  प्रयोग से  पर्यावरण प्रदूषण भयानक हो रहा हैं।  अगली पीढ़ी को स्वस्थ जीवन  नहीं होगा। 

बयो ग्यास प्लान्ट में हर जैव कचरे नहीं डाल सकते हैं। लेकिन केरल के वेटरिनरी यूनिवेऴ्सिटी की प्रोफसर डो. फ्रान्सिस सेव्यर के नेतृत्व में जो एयरोबिक कंपोस्टिंग् टेक्निक द्वारा  किसी भी प्रकार की जैव कचरे को नब्बे दिन में  दुर्गन्ध, बिन से गिर्ते गंदे पानी, मीथैन, कारबनडैओक्सैड  वगैरह के बगैर समीकृत मूलक वाले खाद बना सकते हैं। एक हफ्ते में इस बिन की अंदर  75 डिग्री सेलशियस गर्मी पैदा होगा। इसलिये इस से कोइ बीमारि भैलेगा नहीं। 4’x4’x4′ की आकार में चारों तरफ साफ हवा  की प्रवेश की सुविधा में  गोबर से बाक्टीरिया, सूखे पत्ते से कारबन और ओक्सिजन की सहायता से खाद बनेगा। 

4’x4’x4′  आकार की एयरोबिक बिन के अंदर  जमीन मट्टी या सिमेंन्ट की हो सकते हैं।  सबसे नीचे 6″ की गोबर डालना हैं। उसके ऊपर  6″   सूखे पत्ते डालना होगा। पत्ते के ऊपर  हर किसम के मांस का बचत या मुर्गी की माँस की बचत, मझली की काऩ्टे, सडा हुआ सबजी आदी जैसे किसी भी प्रकार के जैव कचरे 6″ तक डाल सकते हैं। कचरे के ऊपर भिर 6″  गोबर डालना हैं।  इसी प्रकार  परतें  (layers) बनाकर भरना चाहिये। पूरा बिन भरने के बाद नब्बे दिन की आराम देना जरूरी हैं। ऊपर जो चित्र देख रहे हैं वह मेरा घर की कुत्ते बीमारी के कारण मर जाने के बाद उस मृत कुत्ते को बिन में  ऊपरवाले परते  में उपलब्द  सूखे पत्ते, अंडे के झिलके और प्याज की झलके समेत गोपर से डका। 

परंतू आंत में जेंस  (intestinal germs)  की वजह से पेट में हवा भरते हैं और गोबर ऊपर की हिसा में  भट जायेगा और गंद आयेगा। इसलिये उसे गोबर पानी में गोलकर उन भटा लकीर को बंद करना जरूरी हैं।  ऐसे करने से कियी को सह भी नहीं मेहसूस होगा इस के अंदर कुत्ते की मृत शरीर हैं।

खाद नब्बे दिन के बाद निकाल सकते हैं। इस बिन के ऊपर छत होना जरूरी हैं।  तकरीबन चार हजार रुपये में ऐसे एक बिन वना सकते हैं। स्वयम ही बगैर मेसिन के यह बिन बना सकते हैं।  दो साल पहले इस के उद्घाटन ब्लोक मेंबर श्री के. जयकुमार ने की थी (जो सफेद धोती में)। साथ एक कृषि ओफीसर और कृषि असिस्टन्ट हैं।