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पारंपरिक गायों

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भारतीय-गौवंश के बारे में कुछ ख़ास बातें जानने योग्य हैं. एक चिकित्सक के रूप में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि संसार के लगभग सभी रोगों का इलाज भारतीय गौवंश के पञ्च-गव्य, स्पर्श तथा उनकी (गौवंश) की सेवा से संभव है. ऐलोपथिक दवाइयां बनाना-बेचना संसार का सबसे बड़ा व्यापार(हथियारों के बाद)बनचुका है या यूँ कहें की बनादिया गया है. ऐसे में अपने व्यापार को बढाने के लिए हर प्रकार के अनैतिक ,अमानवीय हथकंडे अपनानेवाली बहुराष्ट्रीय-कम्पनियां गौवंश के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकती हैं, इस सच को समझना ज़रूरी है.
भारतीय गौधन को समाप्त करने के हर प्रयास के पीछे इन पश्चिमी कम्पनियों का हाथ होना सुनिश्चित होता है, हमारी सरकार तो केवल उनकी कठपुतली है.इन विदेशी ताकतों की हर विनाश योजना की एक खासियत होती है कि वह योजना हमारे विकास के मुखौटे में हमपर थोंपी जाती है. गोउवंश विनाश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह कैसे ——?

१.दूध बढाने के नाम पर विदेशी गौवंश को बढ़ावा दिया गयाऔर इसके लिए अरबों रूपये के अनुदान दिए गए. भारतीय गौवंश की समाप्ति चुपके से होती चलीगयी. जबकि अमेरिकी और यूरोपीय वैज्ञानिक सन 1986-88 में ही जान चुके थे कि हालिसटीन , फ्रीजियन, जर्सी तथा रेड-डेनिश नामक अमेरिकन-यूरोपियन गौओं के दूध में ‘बीटाकेसिन ए-१’ नामक प्रोटीन पाया गया है जिससे मधुमेह , मानसिक रोग, ऑटिज्म तथा कई प्रकार के कैंसर यथा स्तन, प्रोस्टेट, अमाशय, आँतों, फेफड़ों तक का कैंसर होने के प्रमाण मिले हैं. यह महत्वपूर्ण खोज ऑकलैंड ‘ए-२ कारपोरेशन’ के साहित्य में उपलब्ध है. तभी तो ब्राज़ील ने ४० लाख से अधिक भारतीय गौएँ तेयार की हैं और आज वह संसार का सबसे बड़ा भारतीय गौ वंश का निर्यातक देश है. यह अकारण तो नहीं होसकता. उसने अमेरिकी गोवंश क्यों तैयार नहीं करलिया ? वह अच्छा होता तो करता न. और हम क्या कर रहे हैं ? अपने गो-धन का यानी अपना विनाश अपने हाथों कर रहे हैं न ?

२.दूध बढाने का झांसा देकर हमारी गौओं को समाप्त करने का दूसरा प्रयास तथाकथित दुग्ध-वर्धक हारमोनो के द्वारा किया जा रहा है. बोविन- ग्रोथ (ऑक्सीटोसिन आदि) हारमोनों से २-३ बार दूध बढ़ कर फिर गौ सदा के लिए बाँझ होजाती है. ऐसी गौओं के कारण सड़कों पर लाखों सुखी गौएँ भटकती नजर आती हैं. इस सच को हम सामने होने पर भी नहीं देख पा रहे तो यह बिके हुए सशक्त प्रचारतंत्र के कारण.
३.गोवंश के बाँझ होने या बनाये जाने का तीसरा तरीका कृत्रिम गर्भाधान है. आजमाकर देख लें कि स्वदेशी बैल के संसर्ग में गौएँ अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और सरलता से नए दूध होने वाली बनती हैं. है ना कमाल कि दूध बढाने के नाम पर हमारे ही हाथों हमारे गो-धन कि समाप्ति करवाई जारही है और हमें आभास तक नहीं.
हमारे स्वदेशी गो-धन क़ी कुछ अद्भुत विशेषताएं स्मरण करलें—————–
*इसके गोबर-गोमूत्र के प्रयोग से कैंसर जैसे असाध्य रोग भी सरलता से चन्द रोज़ में ठीक होजाते हैं.

*जिस खेत में एक बार घुमा दिया जाए उसकी उपज आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है जबकि विदेशी के प्रभाव से उपज नष्ट हो जायेगी. चाहें तो आजमालें.
इसके गोबर, गोमूत्र,दूध, घी,दही लस्सी के प्रयोग से भी तो फसलें और हमारे शरीर रोगी बन रहे हैं, इसे समझना चाहिए. विश्वास न हो तो आजमाना चाहिए.
*हमने अपने अनेक रोगियों पर अजमाया है क़ी हमारी गौओं के गोबर से बने सूखे उप्क्प्लों पर कुछ दिन तक नंगे पैर रखने से उच्च या निम्न रक्तचाप ठीक होजाता है. सर से पूंछ क़ी और १५ दिन तक रोज़ कुछ मिनेट तक हाथ फेरने से भी पुराना रक्तचाप ठीक हो जाएगा.

**एक बड़ी कीमती और प्रमाणिक जानकारी यह है कि हमारे गो- बैल के गोबर का टुकडा प्रातः-सायं जलाने से संसार के हर रोग के कीटाणु कुछ ही देर (आधे घंटे) में मर जाते हैं. यदि गोबर के इस टुकड़े पर थोडासा गोघृत लगादेंगे तो असर और बढ़ जाएगा. इस जलते उपले के ऊपर २-४ दाने मुनक्का, दाख, किशमिश या देसी गुड के रख कर जलाने से सोने पर सुहागा सिद्ध होगा. प्लेग, हेजा, तपेदिक तक के रोगाणु नष्ट होना सुनिश्चित है. नियमित दोनों समय २ -३ इंच का गोबर का टुकड़ा इसी प्रकार जलाएं तो असाध्य कीटाणु जन्य रोग ठीक होते नज़र आयेगे, नए रोग पैदा ही नहीं होंगे. हमने ॐ और गोबर के इस प्रयोग से ऐल्ज़िमर के ३ रोगियों का इलाज करने में सफलता प्राप्त क़ी है, आप भी अपनी गोमाता पर विश्वास करके ये कमाल कर सकते हैं.

अब ऐसे में संसार क़ी दवानिर्माता कम्पनियां आपकी गो के अस्तित्वा को कैसे सहन कर सकती हैं. इनकी समाप्ति के लिए वे कुछ भी करेंगी,कितना भी धन खर्च करेंगी, कर रही हैं. विडम्बना यह है कि जिस सच को गो- वंश नाशक कम्पनियां अच्छी तरह जानती हैं उसे आप नहीं जानते. अपने अस्तित्व क़ी रक्षा के लिए, प्राणिमात्र की रक्षा के लिए और सारे निसर्ग क़ी रक्षा के लिए भारतीय गोवंश क़ी रक्षा ज़रूरी है, इस सच को जितनी जल्दी हम जान समझ लें।

धन्यवाद – हिन्दुस्थान का शेर

 देशी गौ वंश के फायदे 

गो वंश की पहचान/ डॉ. राजेश कपूर

स्वदेशी और विदेशी गोवंश को लेकर कुछ विचारणीय पक्ष हैं. अनेक शोधों से सिद्ध हो चुका है कि अधिकांश विदेशी गोवंश विषाक्त cow
प्रोटीन ”बीटा कैसीन ए१” वाला है जो हानिकारक ओपीएट ’बीसीएम७ ’ का निर्माण पाचन के समय करता है और अनेक ह्रदय रोगों के इलावा मधुमेह, ऑटिज्म व बहुत से मानसिक रोगों का कारण है. होलीस्टीन , फ्रीजियन, रेडडैनिश आदि सभी गौएँ इसी घातक प्रो
टीन वाली हैं. दावा किया जाता है कि जर्सी की ७०% ए१ तथा ३०% ए२ प्रोटीन वाली हैं. कौनसी गौएँ किस प्रोटीन वाली हैं, , यह जानने के लिए कोई तंत्र या व्यवस्था बने
होने की जानकारी हमारे पास नहीं है. पर इतना तो प्रत्यक्ष है कि आज भी घातक प्रोटीन वाली होलीस्टीन, फ्रीजियन और उनकी ही संकर नस्ल ’एचऍफ़’ को हम बढ़ावा दे रहे हैं. दूध बढाने के भ्रम में ऐसा करके अनजाने में रोगों को बढ़ावा देने की भूल को समझने और रोकने की ज़रूरत है. यदि जर्सी की कोई नस्ल सही है तो उसका विरोध करने का कोई कारण नहीं है पर इसकी जांच की कोई व्यवस्था तो की जानी चाहिए. ऐसे में लगता है कि पशुपालन की नीतियों का एक बार नए सिरे से मूल्यांकन करें और नए शोध व सूचनाओं के प्रकाश में नीतियों का निर्धारण करें. न्यूज़ीलैंड की ’ए२ कारपोरेशन ने इसप्रकार का यन्त्र बनाया है जिससे गौओं की जांच काके जाँच करके जाना जा सकता है की उसमें कौनसा प्रोटीन कितना है.भारत में भी इस प्रकार के यंत्रों के विकास की आवश्यकता है. ज़रूरी हो तो इसे आयात किया जा सकता है.

हमारे कुछ उपयोगी चकित्सा प्रयोग हमनें अपने रोगियों पर स्वदेशी गोवंश के गोबर तथा गोमूत्र से कुछ उपयोगी प्रयोग किये हैं जो भावी शोध और खोज में उपयोगी सिद्ध हो सकते है. ज्यादा जानकारी केलिये यहाँ जायें

पंचगव्य चिकत्सा और भारतीय गोवंश

भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद परम्परा में अनादी काल से गो का स्थान अत्यंत महत्व का रहा है. पञ्च गव्य के नाम से जाने गए गो उत्पादों का प्रयोग चिकित्सा हेतु व जीवन की विविध गतिविधियों में होता आया है. वेद, उपनिषद्, पुरानों में इनका वर्णन बड़े विस्तार व व्यापक रूप में मिलता है. गो की उत्पत्ति के आधुनिक सिद्धांत हमारे प्राचीन साहित्य से मेल नहीं खाते. वैसे भी अनेक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि पाश्चात्य विद्वानों ने भारतीय संस्कृति की प्राचीनता व श्रेष्ठता को कम व हीन दिखाने के लिए अनेक तथ्यों को छुपाया, विकृत किया व बारम्बार झूठ का सहारा लिया है. इसके अनेकों प्रमाणों को श्री परशुराम शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक ”भारतीय इतिहास का पुनर लेखन, एक प्रवंचना” में देखा जा सकता है. यह पुस्तक बाबा साहेब आप्टे स्मारक समिति, दिल्ली द्वारा प्रकाशित है. अतः गो की उत्पत्ती के विषय में प्रचलित आधुनिक सिद्धांत पर संदेह करने के ठोस कारण हमारे पास उपलब्ध हैं. ये सिद्धांत उन्ही यूरोपीय विद्वानों के घड़े हुए हैं जिनकी नीयत सही न होने के ढेरों प्रमाण परशुराम जी के इलावा पी.एन.ओक, पद्मश्री वाणकर, हेबालकर शास्त्री, बायर्न स्टीरना, एडवर्ड पोकाक, नाकामुरा आदि अनेक विश्व प्रसिद्ध विद्वानों ने दिए हैं. अतः गो की उत्पत्ती और उपयोगिता के भारतीय साहित्य में वर्णित पक्ष को पश्चिम के प्रभाव से मुक्त होकर ; आस्था व गंभीरता से जांचने- परखने की आवश्यकता है.

आज की भारत की परिस्थितियों में भारत की सबसे बड़ी समस्या ” भारतीयों की अपनी सामर्थ्य के प्रति आस्था की कमी है” जिसकी ओर स्वामी विवेकानंद से लेकर डा. अबदुलकलाम तक ने बार-बार इंगित किया है. अतः यह निवेदन करना ज़रूरी है कि हम जब गो की विभूतियों पर चर्चा या कोई प्रयोग करें तो युरोपीय साहित्य को पढ़ कर बनी अश्रधा पूर्ण मानसिकता से सावधानीपूर्वक मुक्त हो लें. अन्यथा हम वही सब करते जायेंगे, वही दोहराते जायेंगे जो कि हमें समाप्त करने के लिए, हमसे करवाने का प्रबंध यूरोपियों ने शिक्षा तंत्र और मीडिया के माध्यम से किया हुआ है। ज्यादा जानकारी केलिये यहाँ जायें